संदेश

गीता समीक्षा अध्याय १८

चित्र
ॐश्रीपरमात्मने नमः                   अथाष्टादशोऽध्यायः           भगवान ने अध्याय दो में सांख्ययोग और कर्मयोग की विधिवत् प्रशंसा की, इस पर अर्जुन को लगा कि भगवान ही भ्रमित कर रहे हैं या मैं भ्रमित हूँ । इसीलिए अर्जुन ने कहा― बुद्धिं मोहयसीव मे ३/२ अर्थात बुद्धि मोहित होती हुई सी । अतः अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया ज्ञानयोगेन सङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ३/३ यह कहकर ज्ञानयोग पर कोई चर्चा ही नहीं करते हैं, सीधे ही कर्मयोग का वर्णन करने लगते हैं । पश्चात चौथे अध्याय में इस ज्ञान की परंपरा के विषय में स्वयं ही प्रवेश करके वहां भी ज्ञान का जो स्वरूप कहा वह भी कर्म प्रधान था अतः पंचम अध्याय में संन्यास और कर्म की श्रेष्ठता विषयक प्रश्न किया और उसी में पूरा छठा अध्याय तक समाहित हो गया । सातवें अध्याय की ऐसी भूमिका बनी कि पूरे सत्रहवें अध्याय तक अवसर ही नहीं मिला कि पुनः संन्यास और कर्म के विषय में स्वरूपतः पूछ सके । अतः अब संन्यास अर्थात ज्ञानयोग और कर्मयोग विषयक जो तीसरे अध्याय से संबद...